क्रिप्टो डेरिवेटिव्स क्या हैं?

डेरिवेटिव एक तरह का फ़ाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट है जो किसी अंडरलाइंग एसेट, जैसे कि स्टॉक, बॉन्ड या क्रिप्टोकरेंसी की वैल्यू को ट्रैक करता है. डेरिवेटिव का इस्तेमाल करके, ट्रेडर्स अलग-अलग तरह के फ़ाइनेंशियल अरेंजमेंट बना सकते हैं और अलग-अलग मार्केट इवेंट्स से फ़ायदा उठा सकते हैं.
क्रिप्टो डेरिवेटिव के साथ, फ़ाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट अपनी वैल्यू किसी खास क्रिप्टोकरेंसी, जैसे कि Bitcoin (BTC) या Ether (ETH) की कीमत से लेते हैं. यह डेरिवेशन क्रिप्टो एसेट्स की कीमतों में उतार-चढ़ाव को इनडायरेक्ट एक्सपोज़र देता है.

डेरिवेटिव कैसे काम करते हैं?
डेरिवेटिव दो पक्षों के बीच फ़ाइनेंशियल कॉन्ट्रैक्ट को दिखाते हैं: एक खरीदार और एक बेचने वाला.
डेरिवेटिव टाइप के आधार पर, ये कॉन्ट्रैक्ट खरीदार को एसेट खरीदने के लिए और बेचने वाले को एसेट बेचने के लिए मजबूर कर सकते हैं. वे किसी खास ट्रांज़ैक्शन को पहले से तय तारीख पर और पहले से तय कीमत पर करना भी ज़रूरी बता सकते हैं.
हालाँकि, हर तरह के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट अलग होते हैं, लेकिन ज़्यादातर में ये हिस्से होते हैं:
अंडरलाइंग एसेट
अंडरलाइंग एसेट वह एसेट है जिस पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट आधारित होता है. क्रिप्टो डेरिवेटिव के लिए, अंडरलाइंग एसेट्स में अलग-अलग क्रिप्टोकरेंसीज़ शामिल हो सकती हैं. जैसे, Ethereum (ETH), Litecoin (LTC), Solana (SOL).
डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट की कीमत अंडरलाइंग एसेट की मार्केट प्राइस के साथ बढ़ती और घटती रहती है.
क्वान्टिटी
क्वान्टिटी का मतलब डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के तहत ट्रेड किए गए अंडरलाइंग एसेट की रकम से है. एक डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट में किसी दी गई क्रिप्टोकरेंसी की सैकड़ों यूनिट हो सकती हैं, जैसे कि Tezos (XTZ), Cardano (ADA) या Avalanche (AVAX).
सेटलमेंट की तारीख
सेटलमेंट की तारीख पहले से तय की गई वह तारीख होती है जिस दिन दोनों पक्षों को कॉन्ट्रैक्ट पूरा करना होता है.
सेटलमेंट की तारीख निकल जाने के बाद, कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का पेमेंट अंडरलाइंग एसेट में या फ़िएट इक्विवेलेंट वैल्यू में किया जा सकता है. हालाँकि, यह ध्यान देने वाली बात है कि कुछ डेरिवेटिव प्रोडक्ट इस तारीख को, जिसे डिलीवरी की तारीख कहा जाता है, सेटलमेंट की तारीख के बाद रखते हैं.
अन्य तरह के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट के लिए, निवेशक, सेटलमेंट की तारीख आने से पहले किसी भी समय अपनी पोज़ीशन बंद कर सकते हैं. कुछ मामलों में, जैसे बिना मियाद के स्वैप कॉन्ट्रैक्ट्स में, निवेशक कितने भी समय तक अपनी पोज़ीशन को खुला रख सकते हैं.
डिलीवरी का तरीका
फिज़िकली डिलीवर किए गए डेरिवेटिव का मतलब है कि कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने के बाद पक्षों के बीच असल अंडरलाइंग एसेट का एक्सचेंज किया गया है. इसलिए, बेचने वाले को कॉन्ट्रैक्ट करने से पहले अंडरलाइंग एसेट खरीदना या होल्ड करना होगा ताकि सेटलमेंट की तारीख आने पर वह उसे कॉन्ट्रैक्ट वाले खरीदार को बेच सके. सेटलमेंट के बाद, खरीदार को Bitcoin (BTC) मिलेगा न कि फ़िएट के बराबर की वैल्यू.
दूसरी ओर, कैश में सेटलमेंट हुए डेरिवेटिव के साथ, कॉन्ट्रैक्ट्स का समाधान Tether (USDT) या फ़िएट जैसे स्टेबलकॉइन का उपयोग करके किया जाता है. इस समाधान का मतलब है कि खरीदारों और विक्रेताओं के बीच अंडरलाइंग एसेट्स का ट्रांज़ैक्शन नहीं होता, बल्कि सिर्फ़ इसके बराबर के कैश में ट्रांज़ैक्शन किया जाता है.
उदाहरण के लिए, अगर दो पक्ष एक बिटकॉइन के लिए कैश सेटलमेंट करके क्रिप्टो डेरिवेटिव का ट्रेड कर रहे हैं, तो कॉन्ट्रैक्ट के हिसाब से एक Bitcoin के बराबर का फ़िएट मूल्य दिया जाएगा, न कि Bitcoin.
क्रिप्टो डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने के लिए कैश-सेटलमेंट सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है.
क्रिप्टो फ़्यूचर्स ट्रेडिंग के क्या फ़ायदे हैं?
इतने जटिल होने के बावजूद, फ़्यूचर्स स्पॉट मार्केट के मुकाबले कई तरह के फायदे देते हैं जिनकी कुछ ट्रेडर्स को ज़रूरत हो सकती है. यह मार्केट में उनकी विशेषज्ञता, ट्रेडिंग स्ट्रेटेजी और जोखिम लेने की क्षमता पर निर्भर करता है.
- अंदाज़ा: फ़्यूचर्स से ट्रेडर्स को खास क्रिप्टो एसेट्स की भविष्य की कीमतों का अंदाज़ा लगाने और किसी भी दिशा में कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का फ़ायदा उठाने की सुविधा मिलती है. फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट पर शॉर्ट पोज़ीशन खोलना, उसके अंडरलाइंग क्रिप्टो एसेट की कीमत गिरने पर फ़ायदा कमाने का सबसे आसान तरीका है.
- कोई एसेट ओनरशिप नहीं: फ़्यूचर्स एक फ़ाइनेंशियल कॉन्ट्रैक्ट है, जो बिना क्रिप्टोएसेट का मालिकाना हक लिए क्रिप्टोएसेट की कीमतों का एक्सपोज़र देता है. ट्रेडर्स, कॉन्ट्रैक्ट खरीद सकते हैं और बिना किसी क्रिप्टोकरेंसी के मालिक बने, बिना उसमें ट्रांज़ैक्शन किए या उसे कस्टडी में रखे अपना फ्रॉफ़िट पा सकते हैं.
- फ़ीस: आमतौर पर, फ़्यूचर्स ट्रेडिंग की फ़ीस स्पॉट ट्रेडिंग की फ़ीस से बहुत कम होती है. Kraken डेरिवेटिव्स क्रिप्टो फ़्यूचर्स मार्केट में सबसे ज़्यादा प्रतिस्पर्धी फ़ीस स्ट्रक्चर देता है, जिसकी फ़ीस 0.01% जितनी कम है.
- लीवरेज फ़्यूचर्स में ट्रेडर्स को लीवरेज का उपयोग करने की अनुमति होती है. यह कॉन्ट्रैक्ट में पहले से होता है और इससे ज़्यादा कैपिटल-एफ़िशिएंट ट्रेडिंग की जा सकती है. साथ ही, यह भी पक्का हो जाता है कि अकाउंट बैलेंस माइनस में न हो. लीवरेज पोज़ीशन को लिक्विडेट किया जा सकता है. लिक्विडेशन के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल यहाँ देखें.
- हेजिंग: अगर आपके पास कोई क्रिप्टो एसेट है, तो आप शॉर्ट फ़्यूचर्स पोज़ीशन ले सकते हैं, जिससे गिरती कीमतों के समय आपका जोखिम कम हो जाता है (या “हेज” हो जाता है). यह क्रिप्टो एसेट को बिना बेचे, कीमत में गिरावट से बचाने का एक असरदार तरीका हो सकता है. आप हमारे आर्टिकल हेजिंग क्या है? में अलग-अलग तरह की हेजिंग स्ट्रेटेजीज़ के बारे में ज़्यादा जान सकते हैं.
- आर्बिट्रेज के अवसर: फ़्यूचर्स आपको क्रिप्टो मार्केट की कमियों का फ़ायदा उठाने की सुविधा देते हैं. ऐसे मामले हो सकते हैं जब आप स्पॉट मार्केट में अंडरलाइंग क्रिप्टो एसेट को लॉन्ग पोज़ीशन और फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट पर शॉर्ट पोज़ीशन लेकर प्रॉफ़िट लॉक कर सकते हैं.
क्रिप्टो डेरिवेटिव्स का उपयोग क्यों करें?
कई लोग खुद कस्टडी रखने और अलग-अलग तरह की क्रिप्टोकरेंसी के असली मालिक होने को ही एक खास फ़ायदा मानते हैं. आप सोच रहे होंगे कि कोई क्रिप्टोकरेंसी में इनडायरेक्ट एक्सपोज़र क्यों चाहेगा.
क्रिप्टोकरेंसी खरीदने और रखने (जिसे स्पॉट ट्रेडिंग कहते हैं) के मुकाबले डेरिवेटिव प्रोडक्ट के कई फ़ायदे और खास क्षमताएँ होती हैं. इनमें से कुछ लाभ इस प्रकार हैं:
- बढ़ी हुई लिक्विडिटी: डेरिवेटिव मार्केट अक्सर ज़्यादा संख्या में स्पेक्युलेटिव ट्रेडर्स को आकर्षित करते हैं, जो ज़्यादा जोखिम उठा सकते हैं. ज़्यादा जोखिम उठाने वाले ट्रेडर्स की इस बढ़ी हुई हिस्सेदारी से ट्रेडिंग एक्टिविटी का लेवल बढ़ जाता है.
- घटती कीमत से लाभ: क्रिप्टो डेरिवेटिव्स से भविष्य में किसी एसेट की कीमत घटने-बढ़ने पर लाभ कमाने का मौका मिलता है. इस वजह से, व्यापारी शॉर्ट पोज़ीशन खोल सकते हैं और एसेट की कीमत घटने पर फ़ायदा पा सकते हैं.
- जोखिम स बचाव (हेजिंग): डेरिवेटिव्स से ट्रेडर्स को अलग-अलग, विपरीत ट्रेड करके अपनी पोज़ीशन में होने वाले नुकसान से बचने की सुविधा मिलती है.
- डाइवर्सिफ़िकेशन: डेरिवेटिव्स से ट्रेडर्स को अलग-अलग तरह की ट्रेडिंग स्ट्रेटेजी बनाने की सुविधा मिलती है, जो रेग्युलर स्पॉट ट्रेडिंग में मुमकिन नहीं हैं.
- लीवरेज के साथ ट्रेड करें: डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने वाले ट्रेडर्स किसी थर्ड-पार्टी से फ़ंड उधार लेकर अपने ट्रेड का साइज़ बढ़ा सकते हैं. इस प्रोसेस को लीवरेज या मार्जिन पर ट्रेडिंग के नाम से जाना जाता है और यह जीते गए ट्रेड से प्रॉफ़िट बढ़ाने में मदद कर सकता है या नुकसान को बढ़ा सकता है.
क्रिप्टो डेरिवेटिव्स के प्रकार
फ़्यूचर्स
क्रिप्टो फ़्यूचर्स, डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट होते हैं जो निवेशकों को क्रिप्टोकरेंसी की भविष्य की कीमत पर दाव लगाने की सुविधा देते हैं.
खरीदार और विक्रेता पहले एक कीमत और ट्रेड सेटलमेंट की तारीख पर सहमति बनाते हैं. फ़्यूचर्स के ट्रेडर्स, कॉन्ट्रैक्ट के अंडरलाइंग एसेट के लिए लॉन्ग या शॉर्ट पोज़ीशन ले सकते हैं. अगर एसेट की कीमत पहले से तय फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट की कीमत से ऊपर जाती है, तो ट्रेडर्स को लॉन्ग पोज़ीशन लेने से फ़ायदा होता है, जबकि अगर एसेट की कीमत फ़्यूचर्स सेटलमेंट की कीमत से नीचे जाती है, तो ट्रेडर्स को शॉर्ट पोज़ीशन से फ़ायदा होता है.
फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के समाप्त होने से पहले, लॉन्ग और शॉर्ट पोज़ीशन रखने वाले ट्रेडर्स अपनी पोज़ीशन को बंद करने का विकल्प चुन सकते हैं. लॉन्ग पोज़ीशन लेने वाले ट्रेडर्स के लिए इसका मतलब है फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट को किसी और को बेचना. शॉर्ट पोज़ीशन लेने वाले ट्रेडर्स के लिए इसका मतलब है अंडरलाइंग एसेट को वापस खरीदना.
इन्वेस्टर्स, ट्रेडिंग के लिए तय किए गए फ़्यूचर्स एक्सचेंज पर फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट ट्रेड करते हैं जो स्टैंडर्ड स्पॉट एक्सचेंज से अलग होते हैं.
यह समझना ज़रूरी है कि फ़्यूचर्स ज़ीरो-सम प्रोडक्ट्स हैं, जिसका मतलब है कि हर फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में एक हारने वाला और एक जीतने वाला होगा. सहमति से तय की गई कॉन्ट्रैक्ट प्राइस और एक्सपायरी के समय से पहले अंडरलाइंग एसेट की मार्केट प्राइस के बीच का अंतर, क्रमशः जीतने वाले और हारने वाले के फ़ायदे या नुकसान को दिखाता है.
फ़्यूचर्स के फ़ायदे और नुकसान
फ़ायदे:
- फ़्यूचर्स के निवेशकों को किसी खास एसेट के लिए भविष्य की कीमत लॉक करके जोखिम से बचने की सुविधा मिलती है.
- फ़्यूचर्स किसी खास एसेट की भविष्य की दिशा का अंदाज़ा लगाते हैं, जिससे निवेशकों को प्राइस मूवमेंट से लाभ मिलता है.
- फ़्यूचर्स, पोर्टफ़ोलियो को डाइवर्सिफ़ाई करने में मदद करते हैं, क्योंकि वे स्टॉक मार्केट से नहीं जुड़े होते.
नुकसान:
- फ़ाइनेंशियल फ़्यूचर्स बहुत ज़्यादा लीवरेज्ड इंस्ट्रूमेंट्स होते हैं, जिसका मतलब है कि निवेशकों ने जितना पैसा लगाया है, उससे ज़्यादा पैसा गँवा सकते हैं.
- ये कॉम्प्लेक्स इंस्ट्रूमेंट्स हैं और इनमें सफलता के साथ ट्रेड करने के लिए बहुत ज़्यादा नॉलेज और एक्सपीरियंस की ज़रूरत होती है.
- फ़ाइनेंशियल फ़्यूचर्स, मार्केट के उतार-चढ़ाव के अधीन होते हैं, जिसका मतलब है कि कीमतें तेज़ी से और अचानक बदल सकती हैं.
ऑप्शन्स
ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट, खरीदारों को एक तय कीमत पर एसेट खरीदने या बेचने का अधिकार देते हैं, लेकिन यह उनकी ज़िम्मेदारी नहीं है.
ऑप्शन के स्टाइल के आधार पर, खरीदार इस तरह के कॉन्ट्रैक्ट को एक्सपायरी से पहले कभी भी, या सिर्फ़ एक्सपायरी के समय इस्तेमाल कर सकते हैं. इन्हें क्रमशः अमेरिकन और यूरोपियन स्टाइल के ऑप्शन के रूप में जाना जाता है.
ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट, फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट से अलग होते हैं क्योंकि अगर ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट फ़ायदे का सौदा नहीं रहा, तो खरीदार के खरीदने या बेचने वाले के बेचने का कोई वादा नहीं होता.
ऑप्शंस के साथ, खरीदने के अधिकार को कॉल ऑप्शन कहा जाता है, जबकि बेचने के अधिकार को पुट ऑप्शन कहा जाता है।
एक ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट में कई हिस्से होते हैं:
- स्ट्राइक प्राइस: वह कीमत जिस पर खरीदार कॉन्ट्रैक्ट का इस्तेमाल कर सकता है.
- समाप्ति की तारीख: वह समय जब कॉन्ट्रैक्ट का इस्तेमाल करने का ऑप्शन खत्म हो जाता है.
- प्रीमियम: कॉन्ट्रैक्ट का इस्तेमाल करने के लिए निवेशक को जो रकम देनी होगी.
चूँकि कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के फ़ायदेमंद न रहने पर ऑप्शन के खरीदार इनका पालन न करना चुन सकते हैं, इसलिए वे ऑप्शन बेचने वाले को प्रीमियम के तौर पर फ़ीस देते हैं.
अगर खरीदार ऑप्शन को बिना इस्तेमाल किए एक्सपायर होने देता है, तो प्रीमियम मुआवज़े के तौर पर काम आता है.
ऑप्शन और प्रीमियम महत्वपूर्ण हैं. अगर कोई प्रीमियम न चुकाना हो, तो कोई भी व्यक्ति बिना कोई पूँजी लगाए इस तरह के कॉन्ट्रैक्ट कर सकता है. इसके अलावा, ऑप्शन बेचने वालों को कॉन्ट्रैक्ट बनाने के लिए कोई फ़ाइनेंशियल इंसेंटिव नहीं मिलेगा.
ऑप्शंस के फ़ायदे और नुकसान
फ़ायदे:
- लचीलापन: ऑप्शंस से निवेशकों को अपने निवेश के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए, अलग-अलग स्ट्रेटेजी में से चुनने की सुविधा मिलती है. ऑप्शंस ट्रेडिंग में मार्केट के उतार-चढ़ाव से बचा जा सकता है या प्राइस मूवमेंट होने पर कीमतों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
- बढ़ी हुई कैपिटल एफ़िशिएंसी: ऑप्शंस में निवेश करने वालों को कम पूँजी में ज़्यादा पोज़ीशन कंट्रोल करके, अपनी पूँजी का फ़ायदा उठाने की सुविधा मिलती है.सीधे $1,000 के एसेट खरीदने की तुलना में, $1,000 के ऑप्शंस प्रीमियम खरीदने पर किसी अंडरलाइंग एसेट की बहुत ज़्यादा क्वान्टिटी का एक्सपोज़र मिल सकता है.
- कम लागत: आमतौर पर, ऑप्शन प्रीमियम फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट जैसे दूसरे डेरिवेटिव की तुलना में खरीदने में बहुत सस्ते होते हैं. उदाहरण के लिए, एक CME Bitcoin फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट की कीमत 5 BTC (प्रेस टाइम पर लगभग $150,000) है.
नुकसान:
- जोखिम: लीवरेज के आधार पर, सिर्फ़ अंडरलाइंग एसेट रखने के मुकाबले, ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट कीमत ज़्यादा तेज़ी से कम हो सकती है.
- जटिलता: ऑप्शंस जटिल और समझने में मुश्किल और हो सकते हैं. निवेशकों को निवेश करने से पहले, हर ऑप्शन से जुड़े जोखिम और फ़ायदों को ज़रूर समझ लेना चाहिए.
- समय की संवेदनशीलता: ऑप्शंस की एक एक्सपायरी डेट होती है, जिसका मतलब है कि निवेशकों को पता होना चाहिए कि उनके ऑप्शंस कब एक्सपायर हो रहे हैं.
परपेचुअल फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट (पर्प्स)
परपेचुअल फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट, जिन्हें पर्प्स या परपेचुअल स्वैप कॉन्ट्रैक्ट्स भी कहा जाता है, रेग्युलर फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट की तरह होते हैं. इनमें लोगों को किसी एसेट की भविष्य की कीमत पर बेटिंग करने की सुविधा देते हैं.
फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट की तरह, परपेचुअल कॉन्ट्रैक्ट भी क्रिप्टोकरेंसी जैसे किसी अंडरलाइंग एसेट की वैल्यू को फ़ॉलो करते हैं और ज़ीरो-सम ट्रेड्स (जितना एक ट्रेडर कमाएगा उतना दूसरा गँवाएगा) की कमाई को दिखाते हैं.
परपेचुअल फ़्यूचर्स और ट्रेडिशनल फ़्यूचर्स के बीच मुख्य अंतर यह है कि परपेचुअल फ़्यूचर्स की कोई पहले से तय एक्सपायरी डेट नहीं होती. ट्रेडर्स अपने परपेचुअल कॉन्ट्रैक्ट्स को जब तक चाहें तब तक ओपन रख सकते हैं.
इनमें एक और बड़ा अंतर यह है कि परपेचुअल फ़्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट अपने अंडरलाइंग एसेट्स के मार्केट प्राइस को कैसे ट्रैक करते हैं.
परपेचुअल डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट की वैल्यू को अंडरलाइंग एसेट की वैल्यू के बराबर रखने के लिए फ़ंडिंग रेट मैकेनिज्म का इस्तेमाल करते हैं. इस सिस्टम में या तो लॉन्ग पोज़ीशन होल्डर्स को शॉर्ट पोज़ीशन होल्डर्स को फ़ीस देनी पड़ती है या इसका उल्टा भी होता है.
लॉन्ग पोज़ीशन, शॉर्ट पोज़ीशन का पेमेंट तब करती हैं जब कॉन्ट्रैक्ट की कीमत अंडरलाइंग एसेट की वैल्यू से ज़्यादा होता है. शॉर्ट पोज़ीशन, लॉन्ग पोज़ीशन का पेमेंट तब करती हैं जब कॉन्ट्रैक्ट की कीमत अंडरलाइंग एसेट की वैल्यू से कम होती है.
यह सिस्टम लॉन्ग और शॉर्ट पोज़ीशन के ट्रेडर्स के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया गया है. उदाहरण के लिए, अगर बहुत सारे लोग लॉन्ग पोज़ीशन पर जा रहे हैं, तो सिस्टम दूसरे निवेशकों को शॉर्ट पोज़ीशन पर जाने और फ़ंडिंग रेट फ़ीस लेने के लिए बढ़ावा देता है.
फ़ंडिंग रेट के तरीके अलग-अलग प्लेटफ़ॉर्म पर अलग-अलग होते हैं, लेकिन ट्रेडर्स आमतौर पर हर आठ घंटे में ये फ़ीस देते हैं या लेते हैं.
आर्बिट्रेज ट्रेडर्स, ज़्यादातर दूसरे पर्प्स ट्रेडर्स के खिलाफ़ जाकर फ़ंडिंग रेट बैलेंस बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. इस तरह के ट्रेडर्स अपने पर्प कॉन्ट्रैक्ट एक्सपोज़र को हेज करते हैं, जिसका मतलब है कि वे नुकसान से बचने के लिए अपोज़िंग ट्रेड खोलते हैं और फ़ंडिंग रेट फ़ीस भी लेते हैं
निवेशक, लेवरेज के साथ परपेचुअल स्वैप ट्रेड कर सकते हैं. इस तरह की पोज़ीशन खोलने के लिए प्लेटफ़ॉर्म पर निवेशकों को शुरुआती मार्जिन जमा करना होता है और एक निश्चित बैलेंस बनाए रखना होता है. इसलिए, लिक्विडेशन का जोखिम अभी भी लागू होता है.
परपेचुअल फ़्यूचर्स के फ़ायदे और नुकसान
फ़ायदे:
- कुछ एक्सचेंज पर हाई लेवरेज रेश्यो उपलब्ध हैं.
- कुछ फ्यूचर्स प्रोडक्ट्स की तुलना में एंट्री में कम रुकावट.
- डेल्टा न्यूट्रल आर्बिट्रेज ट्रेडर्स या मार्केट मेकर्स के लिए कम जोखिम वाला फ़ायदे का मौका.
- क्रिप्टोकरेंसी मार्केट में इनडायरेक्ट एक्सपोज़र.
नुकसान:
- लिक्विडेशन का जोखिम ज़्यादा होता है, खासकर जब ज़्यादा अमाउंट में लेवरेज का इस्तेमाल किया जाता है.
लीवरेज का उपयोग करके क्रिप्टो डेरिवेटिव्स की ट्रेडिंग करना
डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट में ट्रेडिंग करने वाले निवेशक, लीवरेज का फ़ायदा उठा सकते हैं, जो स्पॉट मार्केट में उसी कैपिटल से खरीदी गई ट्रेड पोज़ीशन की तुलना में ज़्यादा एक्सपोज़र देता है. उदाहरण के लिए, 5 गुना लीवरेज का उपयोग करके, एक परपेचुअल स्वैप ट्रेडर $1,000 के डिपॉज़िट में $5,000 का डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट खरीद सकता है. डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट खरीदने या बेचने के लिए जमा की गई पूंजी को इनिशियल मार्जिन कहा जाता है.
दूसरे अकाउंट में मेंटेनेंस मार्जिन होता है, जो शुरुआती मार्जिन से आधा डिपॉज़िट होता है. मेंटेनेंस मार्जिन एक ट्रेडर को एक्सचेंज द्वारा अपनी डेरिवेटिव पोज़ीशन को लिक्विडेट किए बिना एक निश्चित पॉइंट तक नुकसान झेलने की अनुमति देता है.
अगर लीवरेज्ड डेरिवेटिव्स ट्रेड सफल होता है, तो ट्रेडर्स तुलनात्मक रूप से छोटे शुरुआती इन्वेस्टमेंट (स्पॉट मार्केट की तुलना में) से अच्छा-खासा प्रॉफ़िट कमा सकते हैं.
उदाहरण के लिए, अगर कोई ट्रेडर स्पॉट मार्केट में $30,000 में एक बिटकॉइन खरीदता है, तो 100% गेन के लिए BTC की कीमत $60,000 तक बढ़नी होगी. इसी तरह, 100% नुकसान के लिए BTC को $0 पर जाना होगा. ट्रेडर का फ़ायदा या नुकसान बिल्कुल BTC के फ़ायदे या नुकसान के प्रतिशत जैसा ही होता है.
5 गुना लीवरेज पर फ़्यूचर्स ट्रेडिंग करते हुए, $30,000 का शुरुआती मार्जिन डिपॉजिट एक ट्रेडर को $30,000 में पाँच बिटकॉइन खरीदने की सुविधा देता है, जिससे कुल ट्रेड एक्सपोज़र (या नोशनल वैल्यू) $150,000 हो जाता है:
- इस लीवरेज की वजह से, ट्रेडर को अपने $30,000 के शुरुआती मार्जिन ($150,000 नोशनल वैल्यू * +20% = +$30,000) पर 100% का फ़ायदा कमाने के लिए BTC की कीमत सिर्फ़ 20% बढ़कर $36,000 होनी चाहिए.
- हालाँकि, अगर BTC की कीमत 20% गिरकर $24,000 हो जाती है, तो ट्रेडर को अपने शुरुआती मार्जिन का 100% ($150,000 * -20% = -$30,000) का नुकसान होगा.
इस तरह, डेरिवेटिव्स से ट्रेडर्स को स्पॉट ट्रेडिंग की तुलना में अपने रिटर्न को ज़्यादा बढ़ाने की सुविधा मिलती है. लेकिन याद रखें, बड़े लीवरेज के साथ बड़ी ज़िम्मेदारी भी आती है. जितनी तेज़ी से लीवरेज फ़ायदेमंद ट्रेड को बढ़ावा देता है, उतनी ही तेज़ी से यह घाटे वाले ट्रेड को भी बढ़ाता है.